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"खेल सिर्फ चरित्र का निर्माण ही नहीं करते हैं, वे इसे प्रकट भी करते हैं." (“Sports do not build character. They reveal it.”) shankar.chandraker@gmail.com ................................................................................................................................................. Raipur(Chhattigarh) India

Tuesday, 12 July, 2011

मैट ने ले ली गोदा की जगह

0 राजधानी के चुनिंदा अखाड़े अभी भी सहेजे हैं परंपरा को
0 जिम के आगे फीकी पड़ी अखाड़े की चमक


शंकर चंद्राकर
रायपुर।
युवाओं में कभी ताकत व सेहत का पर्याय रहा अखाड़ा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। कहते हैं समय के साथ हर दौर बदलता है, यही बात अखाड़े पर भी लागू होती है। पुराने दौर में युवाओं व लोगों के बीच अखाड़ा काफी लोकप्रिय था और कुश्ती पहलवानों की ताकत का पैमाना होता था, लेकिन समय के साथ अब अखाड़े की चमक फीकी पड़ गई और उसकी जगह जिम ने ले ली। कभी मिट्टी के गोदा में प्रैक्टिस करने वाले पहलवान अब मैट में कुश्ती के दांव-पेंच सीखने लगे हैं। बदलाव के बावजूद राजधानी के चुनिंदा अखाड़े अभी भी परंपरा को सहेजे हुए हैं और मिट्टी के गोदा में पहलवान तैयार करने में लगे हुए हैं।
छत्तीसगढ़ में अन्य शहरों के मुकाबले रायपुर शुरू से ही अखाड़े का गढ़ रहा है। यहां प्रदेश के अन्य शहरों के मुकाबले सबसे ज्यादा अखाड़े थे और अभी भी नौ-दस अखाड़े हैं। इनमें मां दंतेश्वरी अखाड़ा गोपियापारा पुरानीबस्ती, सत्तीबाजार अखाड़ा, बढ़ईपारा अखाड़ा, सिकंदर शक्ति व्यायामशाला गुढ़ियारी, रामकुंड अखाड़ा, जोरापारा अखाड़ा, पंडरी अखाड़ा, शीतला अखाड़ा टिकरापारा व भांठागांव अखाड़ा शामिल हैं। जैतूसाव मठ सबसे पुराना अखाड़ा है, लेकिन अब यह बंद हो चुका है। सिकंदर शक्ति अखाड़ा अब व्यायामशाला का रूप ले लिया है। कई अखाड़े नागपंचमी पर सालाना आयोजन कराते हैं। यहां से राष्ट्रीय स्तर पर उस्ताद स्व. बिहारीलाल यादव को छोड़कर पहलवानी में कोई बड़ा नाम भले ही न हों, लेकिन प्रदेशस्तर पर यहां के अखाड़ों के पहलवानों की तूती बोलती थी। बढ़ईपारा अखाड़े से स्व. कुंजबिहारी यादव, दंतेश्वरी अखाड़े से पुरन पहलवान व अशोक पहलवान, पंडरी अखाड़े से सरताज अली, सिकंदर शक्ति अखाड़ा गुढ़ियारी से स्व. छोटेलाल कोशले, अर्जुन जोशी, रज्जू कोशले व बुधराम सारंग,  सत्तीबाजार अखाड़े से दीप गुप्ता, राजू व सोहेल अख्तर और जोरापारा अखाड़े से स्व. बाबूलाल साहू जैसे कई ऐसे नाम हैं, जिन्होंने प्रदेश स्तर पर अपने प्रदर्शन से कुश्ती को लोकप्रियता दिलाई। समय के साथ अब अखाड़े के स्वरूप भी बदल गया और कुश्ती लड़ने और प्रैक्टिस करने का तरीका भी बदल गया। पहले अखाड़े में पहलवान लंगोट पहनकर मिट्टी के बने गोदा में कुश्ती लड़ते थे और चित्त-पट्ट के आधार पर कुश्ती होती थी, लेकिन अब कुश्ती को अंतरराष्ट्रीय खेल का दर्जा मिलने से यह एक टेक्नीकल खेल बन गया है। अब माडर्न कुश्ती मैट में खेली जाती है। लंगोट की जगह पहलवानों को स्पेशल सूट पहनना पड़ता है और स्पर्धा प्वाइंट आधार पर होती है।
इस बदलाव ने युवा वर्ग को अखाड़े की जगह जिम की ओर आकर्षित कर दिया। आजकल के युवा मिट्टी की गोदी के बजाय मैट में प्रैक्टिस करने और जिम की आधुनिक मशीनों से व्यायाम करना ज्यादा पसंद करते हैं। यही वजह है कि अब अखाड़े कम और आधुनिक मशीनों से सजे जिम ज्यादा खुल गए हैं। जिम के चमक-दमक में गोदा की मिट्टी की खूशबू गायब होने लगी है।

गौरवशाली इतिहास है दंतेश्वरी अखाड़े का
मां दंतेश्वरी अखाड़ा करीब 165 साल पुराना है। इस अखाड़े का गौरवशाली इतिहास रहा है। आजादी के दशक में राष्ट्रीय स्तर पर कुश्ती में छत्तीसगढ़ का नाम रोशन करने वाले उस्ताद स्व. बिहारीलाल यादव इसी अखाड़े से निकले हैं। उस्ताद बिहारी लाल ही अंचल एकमात्र ऐसे पहलवान हैं, जिन्होंने उस समय विभिन्ना राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में हिस्सा लिया, लेकिन उस समय ज्यादा प्रचार नहीं होने से प्रदेश में भी वे अनजाने ही रह गए। दंतेश्वरी अखाड़ा के उस्ताद अशोक पहलवान कहते हैं कि राजधानी ही नहीं पूरे छत्तीसगढ़ में अखाड़े की पुरानी परंपरा रही है। स्थापना से लेकर अब तक यहां के पहलवान नियमित रूप से गोदा में ही प्रैक्टिस करते आ रहे हैं। चालीस-पचास के दशक में इसी अखाड़े के उस्ताद स्व. बिहारी लाल ने राष्ट्रीय स्तर पर छत्तीसगढ़ का परचम फहराया था। इस पीढ़ी में इसी अखाड़े की मेंहदी यादव ने नेशनल स्तर पर प्रदेश को स्वर्ण पदक दिलाकर छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया है। उन्होंने बताया कि अपने जीवन काल में उस्ताद स्व. बिहारीलाल को किसी भी कुश्ती स्पर्धा में हार नहीं मिली थी। वे जीते या बराबरी पर छूटे।

आधुनिक कुश्ती मुर्गा लड़ाई
इस संबंध में पूर्व पहलवान व विक्रम अवार्डी बुधराम सारंग का कहना है कि गोदा में खेलने का अलग ही मजा होता है। पहलवान की असली ताकत तो गोदा में खेलने से बनती है। आज की कुश्ती तो पूरी तरह टेक्नीकल बन गया है। मैट में खेली जाने वाली कुश्ती मुर्गा लड़ाई की तरह है। जोरा अखाड़े के उस्ताद बाबूलाल साहू का कहते हैं कि आजकल के युवा मिट्टी के गोदा में खेलना पसंद नहीं करते और आधुनिक कुश्ती भी मैट में खेली जाती है। इस कारण अब कई अखाड़े व्यायामशाला में बदल गया है और मिट्टी के गोदे का अस्तित्व समाप्त होने लगा है। फिर भी राजधानी के कई अखाड़े अपनी पुरानी परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। यह खुशी की बात है।

औषधियों से बनती है गोदा की मिट्टी
अखाड़े के गोदे की मिट्टी को कई प्रकार की औषधियों के मिश्रण से मिलाकर बनाई जाती है। इस कारण इसमें प्रैक्टिस करने वाले पहलवानों के शरीर स्वस्थ रहने के साथ ही ताकतवर बनता है। औषधि का मिश्रण होने से गोदे की मिट्टी कई तरह की बीमारियों से दूर भगाने का काम भी करती है।

उस्तादों का दौर गया
अखाड़ों का दौर चले जाने से उस्तादों का दौर भी चला गया। पहले उस्ताद पहलवानों को मिट्टी के गोदा में कुश्ती के दांव-पेंच सिखाते थे। अब उनके स्थान पर कोच ने ले लिया है, जो पहलवानों को मैट पर कुश्ती के नियम-कायदे व टेक्नीक सिखाते हैं।

जीवित है परंपरा
आधुनिक कुश्ती के बावजूद राजधानी के सभी प्रमुख अखाड़े अभी भी गोदे की पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। अब उनके अखाड़े में पहलवान भले ही कम हों, लेकिन उन्हें पुराने तरीके से ही कुश्ती सिखाते हैं और प्रैक्टिस कराते हैं।

नागपंचमी पर ठोकेंगे ताल
इस साल नागपंचमी पर विभिन्ना अखाड़े अपने-अपने स्तर पर आयोजन करते हैं। गुढ़ियारी में सिकंदर शक्ति व्यायामशाला हर साल इस दिन राज्य स्तरीय कुश्ती प्रतियोगिता आयोजित करती है। मां दंतेश्वरी अखाड़ा भी पूजा-अर्चना के साथ कुश्ती स्पर्धा का आयोजन करेगा।

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